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मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से झटका, नामांकन रद्द करने के खिलाफ याचिका खारिज

मध्यप्रदेश राज्यसभा चुनाव विवाद में कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। अदालत ने उनका नामांकन रद्द किए जाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी और कहा कि ऐसे मामलों में चुनाव याचिका ही उचित कानूनी उपाय है।

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मध्यप्रदेश राज्यसभा चुनाव से जुड़े विवाद में कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। शीर्ष अदालत ने उनके राज्यसभा नामांकन पत्र को निरस्त किए जाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नामांकन पत्र खारिज होने जैसे मामलों को चुनौती देने का उचित माध्यम चुनाव याचिका (Election Petition) है और चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि मीनाक्षी नटराजन के सभी कानूनी अधिकार और दलीलें चुनाव याचिका में खुली रहेंगी।

 

सुप्रीम कोर्ट पर कोई आरोप नहीं

अदालत के फैसले पर कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन ने कहा, "मेरा कोई आरोप सर्वोच्च न्यायालय पर नहीं है। चुनाव आयोग के RO कॉम्प्रोमाइजड थे ये मैंने पहले दिन भी कहा। ECI के पास जब हमारे लोग गए तो उन्होंने 48 घंटे तक जवाब नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कम से कम हमारी बात सुनी। चुनाव आयोग इस तरह से मिला है कि उन्होंने उस पर कोई जवाब तक नहीं दिया। हमारा मामला RO और ECI के खिलाफ था। लेकिन आज स्टेट ऑफ मध्यप्रदेश ने अपना भी वकील खड़ा किया। इससे आराम से समझ में आता कि क्या सांठगांठ चल रही है।"

केस से जुड़े अहम बिंदु

  • सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस लीडर मीनाक्षी नटराजन की अर्जी को खारिज कर दिया। उन्होंने मध्यप्रदेश राज्यसभा चुनाव के लिए उनके नॉमिनेशन के रिजेक्शन को चुनौती दी थी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, नॉमिनेशन पेपर के रिजेक्शन को चुनौती देने के लिए आम तौर पर इलेक्शन पिटीशन के जरिए ही आगे बढ़ना चाहिए।
  • नॉमिनेशन के "साफ तौर पर" या "साफ तौर पर गैर-कानूनी" रिजेक्शन का आरोप लगाने वाले मामलों में भी आर्टिकल 32 के तहत कोई छूट देने से मना कर दिया।
  • दोहराया कि आर्टिकल 329(b) चुनाव प्रोसेस के दौरान कोर्ट के दखल पर रोक लगाता है और कोर्ट ऐसे मामलों की कैटेगरी नहीं बना सकते जिनमें चुनाव के बीच में दखल की जरूरत हो।
  • अदालत द्वारा साफ किया गया कि, इलेक्शन पिटीशन में पिटीशनर के सभी अधिकार और दलीलें खुली रहती हैं और ऑर्डर में की गई बातें ऐसी कार्रवाई पर कोई असर नहीं डालेंगी।

फॉर्म-26 और हलफनामे का नियम
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पीके मिश्रा ने कहा - जवाब देने वालों ने 'कंडक्ट ऑफ इलेक्शंस रूल्स, 1961' के नियम 4A का भी हवाला दिया। नियम 4A के अनुसार, उम्मीदवार या उसके प्रस्तावक (जैसा भी मामला हो) को 'रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1951' की धारा 33(1) के तहत नॉमिनेशन पेपर जमा करते समय, फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट या नोटरी के सामने शपथ लेकर फॉर्म 26 में एक हलफनामा भी जमा करना होगा।

यह कहा गया कि, फॉर्म 26 में उम्मीदवार को कई तरह की जानकारी देनी होती है। खास तौर पर फॉर्म 26 के क्लॉज 5 पर जोर दिया गया।

पक्षकारों के अनुसार, याचिकाकर्ता की यह जिम्मेदारी थी कि, वह सभी लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी दे चाहे वे मामले किसी भी चरण में हों। यह तर्क दिया गया कि, जानकारी देना सिर्फ उन मामलों तक सीमित नहीं है जिनमें आरोप तय हो चुके हैं।

इसलिए जवाब पक्षकारों ने कहा कि, फॉर्म 26 के क्लॉज 5 के तहत जरूरी जानकारी न देने से हलफनामा अधूरा माना जाएगा और नॉमिनेशन रद्द करना सही होगा। नतीजतन, रिटर्निंग ऑफिसर ने याचिकाकर्ता का नॉमिनेशन रद्द करने में कानून की कोई गलती नहीं की।

अनुच्छेद 329(b) का दिया हवाला
बार एन्ड बेंच के मुताबिक जस्टिस पीके मिश्रा ने कहा कि, 'हमने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया है। चुनाव से जुड़े विवादों में इस कोर्ट ने हमेशा उन सिद्धांतों का पालन किया है जो तय किए गए हैं। जब भी चुनाव प्रक्रिया के दौरान आर्टिकल 32 के तहत इस कोर्ट या आर्टिकल 226 के तहत हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने की कोशिश की गई है, तो इस कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 329(b) में दिए गए संवैधानिक आदेश को ध्यान में रखते हुए बार-बार दखल देने से इनकार किया है।'

सिंघवी की दलील कोर्ट ने नहीं की स्वीकार
'डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी का मुख्य तर्क यह है कि, जब नॉमिनेशन रद्द करना साफ तौर पर गैर-कानूनी, मनमाना और गलत हो, तो इस कोर्ट को दखल देना चाहिए। वरना, चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता ही खतरे में पड़ जाएगी। कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि, हम इस दलील को स्वीकार नहीं कर सकते।

दो श्रेणियों में नहीं बांटे जा सकते चुनावी विवाद
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, 'अगर ऐसा अंतर माना जाता, तो अदालतों को चुनाव विवादों को दो श्रेणियों में बांटना पड़ता - पहली, वे जिनमें साफ तौर पर बड़ी गलतियां हों और आर्टिकल 32 या 226 के तहत तुरंत दखल की जरूरत हो और दूसरी, वे जिनमें पीड़ित पक्ष को चुनाव याचिका के जरिए समाधान का इंतजार करना पड़े।'

'संविधान के आर्टिकल 329(b) में ऐसे किसी अंतर की कोई जगह नहीं है। याचिकाकर्ता की बात को मानने का मतलब होगा संविधान की व्यवस्था में एक ऐसा अपवाद जोड़ना, जिसका जिक्र खुद संविधान में नहीं है।'

जस्टिस पीके मिश्रा ने कहा कि, 'हमें डर है कि अगर अदालतों को कुछ मामलों में नॉमिनेशन रद्द होने के खिलाफ चुनौती सुनने की इजाजत दी जाए, जबकि दूसरे उम्मीदवारों को चुनाव याचिका के कानूनी उपाय तक ही सीमित रखा जाए, तो यह स्थापित संवैधानिक स्थिति के खिलाफ होगा और इसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।'

'ऊपर बताई गई बातों को देखते हुए, हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस याचिका पर विचार करने के पक्ष में नहीं हैं। इसलिए, यह रिट याचिका खारिज की जाती है।'

भविष्य में चुनाव याचिका का अधिकार सुरक्षित
जस्टिस पीके मिश्रा ने स्पष्ट किया कि, 'यह साफ करने की जरूरत नहीं है कि, इस आदेश में याचिकाकर्ता का नॉमिनेशन रद्द होने के आधार के बारे में जो भी बातें कही गई हैं वे सिर्फ इस कार्यवाही के स्वीकार्य होने पर विचार करने के मकसद से कही गई हैं।'

'इसमें कही गई किसी भी बात का असर याचिकाकर्ता या किसी अन्य व्यक्ति के उन अधिकारों और तर्कों पर नहीं पड़ेगा, जो कानून के अनुसार सक्षम हाई कोर्ट में दायर की जा सकने वाली किसी चुनाव याचिका में उठाए जा सकते हैं।'

मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा चुनाव से जुड़ा पूरा मामला

  • कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन ने मध्यप्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया था।
  • भाजपा ने आरोप लगाया था कि नटराजन ने अपने खिलाफ लंबित एक कानूनी मामले की जानकारी नहीं दी।
  • रिटर्निंग ऑफिसर ने भाजपा की आपत्ति स्वीकार करते हुए मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त (रद्द) कर दिया था।
  • कांग्रेस ने इस फैसले को गलत बताते हुए चुनाव आयोग और बाद में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
  • सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता और इस विवाद को चुनाव याचिका (Election Petition) के जरिए चुनौती दी जा सकती है।


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