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ईरान-इजराइल युद्ध: क्या मध्य-पूर्व एक और ‘महायुद्ध’ की दहलीज पर

अगर यह लड़ाई लंबी खिंचती है, तो यह खाड़ी देशों के लिए एक असली बदलाव बिंदु बन सकती है। एक ऐसा मोड़, जो देशों की सुरक्षा, उभयपक्षीय सहयोग और यहां तक कि उनके लंबे समय के आर्थिक भविष्य के बारे में सोचने के तरीके को बदल देगा

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ईरान पर अमेरिका-इजराइल के व्यापक हमले को दो दिन हुए हैं, यह पहले से ही साफ है कि इसका मध्य-पूर्व और खासकर खाड़ी पर गहरा असर पड़ेगा। अमेरिका-इजराइल की बमबारी में कई बड़े अधिकारियों के साथ सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और उनके परिवार के लोग भी मारे गए हैं। ईरान में 40 दिन का शोक है। तेहरान ने न सिर्फ इजराइल बल्कि इस इलाके के कई देशों पर हमले करके जवाब दिया है।

सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत और ओमान सभी पर ईरानी मिसाइलों या ड्रोन से हमला किया गया, जबकि इनमें से किसी भी देश ने अपने इलाके से ईरान पर हमला नहीं किया था। इन देशों में कई जगहों को निशाना बनाया गया, जिनमें अमेरिकी सैन्य अड्डे, हवाई अड्डे, बंदरगाह और वाणिज्यिक इलाके भी शामिल थे।

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अगर यह लड़ाई लंबी खिंचती है, तो यह खाड़ी देशों के लिए एक असली बदलाव बिंदु बन सकती है। एक ऐसा मोड़, जो देशों की सुरक्षा, उभयपक्षीय सहयोग और यहां तक कि उनके लंबे समय के आर्थिक भविष्य के बारे में सोचने के तरीके को बदल देगा। ईरान से जुड़ा कोई भी लंबा संघर्ष समुद्री यातायात को प्रभावित करेगा, खासकर होर्मुज की खाड़ी, जो दुनिया की आर्थिक धमनियों में से एक है। थोड़ी बहुत रुकावट से ऊर्जा की कीमते तेज हो जाएंगी, जो निवेशकों के लिए नई चिंता पैदा कर सकती हैं।

हां, तेल की ज्यादा कीमतें अल्पकालिक राजस्व को बढ़ा सकती हैं, फिर भी ऊर्जा बाजार असंतुलित हो जाएगा। क्या ट्रंप तेल की कीमतों में भी उछाल चाहते थे? चीन और रूस ज्यादा देर चुपचाप नहीं रहेंगे। मास्को यदि सीधा नहीं भी कूदा, मगर इस उथल-पुथल का फायदा उठाकर हथियारों की बिक्री बढ़ा सकता है, वह क्षेत्रीय बंटवारे का भी लाभ उठा सकता है।

इस संदर्भ में जो वार्ता जिनेवा में चल रही थी, उसे ठीक से देखा जाए तो जो लोग मध्यस्थता कर रहे थे, उन्हें भी भरोसे में नहीं लिया गया। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराकची ने वार्ता के इस दौर को, जो ओमान की मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजंसी के महानिदेशक राफेल ग्रासी की उपस्थिति में आयोजित किया गया था, आज तक की ‘सबसे गंभीर और सबसे लंबी’ वार्ता बताया था।

ईरान के विदेश मंत्री ने वार्ता के माहौल और ओमान की मध्यस्थता की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा था कि कुछ मुद्दों पर सहमति बहुत करीब आ गई है। बेशक, अभी भी मतभेद मौजूद हैं, जो स्वाभाविक है, लेकिन पहले की तुलना में बातचीत के समाधान तक पहुंचने के लिए दोनों पक्षों में अधिक गंभीरता देखी जा रही है।

उधर ईरान के विदेश मंत्री की घोषणा के अनुसार, ‘इस बात पर सहमति हुई कि सोमवार से तकनीकी टीमें वियना में और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजंसी में विशेषज्ञ समीक्षा शुरू करेंगी। इस बैठक का उद्देश्य कुछ तकनीकी मुद्दों को एक निश्चित ढांचे में व्यवस्थित करना बताया गया है।’ अराकची के मुताबिक, यह तय हुआ था कि हमारे विशेषज्ञों की अगले सोमवार को एजंसी के साथ बैठक होगी। वहां कुछ तकनीकी पहलुओं पर चर्चा की जानी है, ताकि ये तकनीकी पहलू स्पष्ट हो सकें, जिसके बाद हम राजनीतिक बैठकों में उन पर निर्णय ले सकें।’

अराकची के बयानों से निकट भविष्य में वार्ता के चौथे दौर के आयोजन की योजना की भी जानकारी मिली कि यह बैठक लगभग एक सप्ताह में आयोजित होगी। इस अंतराल में दोनों पक्षों को कुछ कदम उठाने होंगे, दस्तावेज तैयार करने होंगे और स्वाभाविक रूप से अपनी-अपनी राजधानियों में आवश्यक परामर्श करने होंगे। प्रतिबंधों को लेकर ईरान के रुख को स्पष्ट करते हुए जोर दिया गया कि तेहरान की अपेक्षाएं स्पष्ट रूप से रखी गई हैं।

अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अमेरिका के रणनीतिक सहयोगी ओमान से भी इस सैन्य कार्रवाई की सूचनाओं को साझा नहीं किया गया था। ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी ने जिनेवा में ईरान और अमेरिका के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता के तीसरे दौर को ‘रचनात्मक और सकारात्मक’ विचारों के आदान-प्रदान वाला बताया था और इन वार्ताओं का समर्थन जारी रखने के लिए ओमान की प्रतिबद्धता पर जोर दिया था। ओमानी विदेश मंत्री बद्र बिन हमद अल बुसैदी ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से मुलाकात के बाद कहा था कि परमाणु बातचीत अब तक की सबसे सकारात्मक, अहम और उपलब्धियों वाली थी।

मगर क्या वाइट हाउस ने पहले से तय कर रखा था कि बातचीत के धोखे में हमला किया जाएगा? ईरान से आने वाली खबरों से पता चलता है कि तेहरान में यूनिवर्सिटी स्ट्रीट और जोम्हौरी इलाके में तथा ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कार्प्स मुख्यालय के पास हमला किया गया। इसके अलावा, अलग-अलग खबर आर्इं कि ईरान की राजधानी में एक हमला सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के दफ्तर के पास हुआ। तेहरान के उत्तरी सैय्यद खानदान इलाके में भी धमाके हुए। तबरीज, कर्मनशाह, काम, इलाम, इस्फाहान, लारेस्तान जैसे शहरों में बमबारी हुई है।

अभी दो बातें स्पष्ट नहीं है कि लड़ाई कितने दिनों तक छिड़ी रहेगी। इसके अलावा, क्या लेबनान से हिजबुल्ला और यमन में हूती विद्रोही इजराइल के विरुद्ध हमले करेंगे। तेहरान इस पर सहमत था कि वह बैलिस्टिक मिसाइलों के जखीरे को कम कर देगा। तेहरान सिविल न्यूक्लियर यूरेनियम के प्रसंस्करण पर लगी पाबंदियों पर बात करने में लचीला रुख दिखा चुका था, लेकिन अपनी मिसाइलें पूरी तरह से समाप्त करने पर वह सहमत नहीं था।सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि विएना में बैठे रणनीतिकार इजराइल के पास नाभिकीय हथियारों और मिसाइलों की बात कभी नहीं उठाते। यह नहीं पूछा जाता कि इजराइल के पास नब्बे परमाणु हथियार हैं या दो सौ! वह ऐसे हथियारों की मौजूदगी की न तो पुष्टि करता है और न ही खंडन। माना जाता है कि वह मिसाइलों, पनडुब्बियों और विमानों से परमाणु हथियार दागने में सक्षम है। 2024 में इजराइल ने अपने परमाणु बमों के निर्माण और रखरखाव पर 11 बिलियन अमेरिकी डालर खर्च किए थे। अगर केवल परमाणु हमले की धमकी भर को लेकर ईरान पर हमला किया जा सकता है, तो उस तरह की धमकी पाकिस्तान कई बार भारत को दे चुका है।ईरान पर हमला ऐसे वक्त हुआ है, जब पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच बमबारी चल रही है। पाकिस्तान ने इस सैन्य अभियान को आपरेशन ‘गजब लिल-हक’ नाम देते हुए खुली जंग का एलान कर दिया है। पाकिस्तान का दावा है कि उसके हमले में 130 से अधिक तालिबान लड़ाके मारे गए हैं। यह कितना अजीब है कि जो डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध विराम का छद्म दावा गाहे-बगाहे करते रहते हैं, उनके बारह महीनों के कार्यकाल में सात देशों पर हमले हुए और एक नेता को बंदी बनाया गया। सबसे दुख की बात यह है, कि ट्रंप की एकतरफा कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय मूकदर्शक बना हुआ है।



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