"भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकार के बावजूद पिछड़ रहा दुर्ग, जनता को फिर सरोज पांडे से उम्मीदें"
दुर्ग। भाजपा की महापौर अलका बाघमार को भारी बहुमत से जीत दिलाकर दुर्ग की जनता ने बेहतर शहर प्रबंधन और विकास की जो उम्मीदें बांधी थीं, वे अब धराशायी होती नजर आ रही हैं। नगर निगम दुर्ग का संचालन किसी ठोस विजन या मिशन के तहत नहीं हो रहा है। नतीजतन शहर की बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं और विकास कार्यों की गति कछुआ चाल से भी धीमी हो गई है।
अतिक्रमण अभियान बना मज़ाक
महापौर ने कार्यकाल की शुरुआत में अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया था, लेकिन बिना ठोस योजना और दूरदर्शिता के यह मुहिम जल्द ही ढीली पड़ गई। बारिश के मौसम में इंदिरा मार्केट की दुकानों को तोड़कर लोगों की आजीविका छीन ली गई, बिना किसी पुनर्वास की व्यवस्था के। इससे आम जनता में रोष है और नगर निगम की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।
बुनियादी समस्याओं से त्रस्त जनता
पानी, सड़क और सफाई जैसी मूलभूत सुविधाओं की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। नगर निगम के प्रशासनिक तंत्र में कसावट का अभाव है। अधिकारी बेलगाम हैं, पार्षद और MIC के सदस्य बजट की कमी से परेशान हैं। निगम की योजनाएं सिर्फ फाइलों में सिमटकर रह गई हैं।
राज्य से बजट लाने में विफल महापौर
महापौर राज्य सरकार से कोई विशेष परियोजना या बजट नहीं ला सकीं। ऐसे में दुर्ग के विधायक ने R.E.S. के माध्यम से सीधे विकास कार्य करवाना शुरू कर दिया, जिससे नगर निगम खुद हाशिए पर चला गया है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि निगम का नेतृत्व प्रभावहीन हो चुका है।
कमजोर नेतृत्व, बिखरता समन्वय
भाजपा के स्थानीय संगठन में समन्वय का अभाव दिख रहा है। स्व. हेमचंद यादव के समय जैसा सामूहिक नेतृत्व अब नजर नहीं आता। सांसद सरोज पांडे भी अब पहले जैसी सक्रिय नहीं दिख रहीं, जबकि उनके कार्यकाल में शहर को करोड़ों की योजनाएं मिली थीं।
जिलाध्यक्ष की उपेक्षा, संगठन और सत्ता में दूरी
भाजपा के युवा जिलाध्यक्ष सुरेंद्र कौशिक को संगठन में तो जिम्मेदारी मिल गई, लेकिन उन्हें सत्ता पक्ष से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। संगठन और नगर निगम में आपसी तालमेल की भारी कमी दिख रही है, जिससे भाजपा की "ट्रिपल इंजन सरकार" का लाभ दुर्ग को नहीं मिल पा रहा।
दुर्ग को चाहिए मजबूत नेतृत्व
जनता का मानना है कि सरोज पांडे को एक बार फिर आगे आकर दुर्ग के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उनके बाद आए महापौरों को जनता "डमी" मानती रही है, जिनके पास न दूरदृष्टि है, न ही कोई विकास का स्पष्ट रोडमैप।
निष्कर्षतः, दुर्ग जैसे ऐतिहासिक और औद्योगिक शहर को फिर से विकास की पटरी पर लाने के लिए एकजुटता, सक्रिय नेतृत्व और ठोस योजनाओं की जरूरत है। वरना ट्रिपल इंजन की सरकार भी इस शहर को गति देने में विफल ही साबित होगी।
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