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ब्रह्माकुमारीज आनंद सरोवर बघेरा में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पर्व "छेरछेरा पुन्नी" का आयोजन

ब्रह्माकुमारीज आनंद सरोवर बघेरा में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पर्व "छेरछेरा पुन्नी" का आयोजन

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 Durg //प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के बघेरा स्थित"आनंद सरोवर" के "कमला दीदी" सभागार में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पर्व "छेरछेरा पुन्नी" का आयोजन किया गया । इस अवसर पर दुर्ग संसदीय क्षेत्र के लोकप्रिय सांसद विजय बघेल,दुर्ग नगर निगम के महापौर श्रीमती अलका बाघमार,संजय बोहरा,सुनीता बोहरा एवं अनेक गणमान्य नागरिकगण इस आयोजन में सम्मिलित हुए। आगंतुक अतिथियों का पारंपरिक गीतों एवं मनमोहक नृत्य के द्वारा चयन,विवेक और तरुण भाई ने स्वागत किया ।Image after paragraph

              अतिथियो का ब्रह्मकुमारी बहनों ने पुष्प गुच्छ से स्वागत किया तत्पश्चात ब्रह्माकुमारीज दुर्ग की संचालिका रीटा दीदी ने छेरछेरा पुन्नी पर्व के विषय में अपने उद्बोधन में बताया छत्तीसगढ़ के लोकपर्व छेरछेरा पुन्नी की शुरुआत कलचुरी राजवंश के राजा कल्याण साय के समय हुयी। राजा कल्याण साय राजनीतिक और युद्ध कला की शिक्षा लेने के लिए अकबर की सल्तनत में दिल्ली गए थे। वे लगभग आठ वर्षों तक अपने राज्य रतनपुर से दूर रहे। जब राजा कल्याण साय आठ वर्षों के बाद वापस रतनपुर लौटे, तो उनकी प्रजा बहुत उत्साहित हुई । प्रजा ने ढोल-बाजे और लोक-गीतों के साथ राजा का भव्य स्वागत किया। राजा की अनुपस्थिति में उनकी पत्नी रानी फुलकेना ने राजकाज संभाला था और वे भी अपने पति को इतने लंबे समय बाद देखकर बहुत खुश थीं। प्रजा के इस असीम प्रेम और खुशी को देखकर, रानी फुलकेना ने प्रजा को सोने चांदी के सिक्के दान किये और हर वर्ष इस दिन को एक त्योहार के रूप में मनाने का आदेश दिया। 

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            चूंकि यह वह समय था जब किसान अपनी नई फसल काटकर और मिसाई करके अनाज अपने घरों के भंडार (कोठी) में रख चुके होते थे, इसलिए इस दिन को फसल उत्सव और दान के पर्व के रूप में भी मनाया जाने लगा। लोग खुशी-खुशी एक-दूसरे को और जरूरतमंदों को अन्न दान करते हैं। इसी कारण इस दिन बच्चे और बड़े घर-घर जाकर "छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा" (अर्थात: छेरछेरा, माँ कोठी से धान निकालो) कहते हुए दान मांगते हैं। 

      जनश्रुति है कि एक समय धरती पर घोर अकाल पड़ी। अन्न, फल, फूल व औषधि नहीं उपज पाई। इससे मनुष्य के साथ जीव-जंतु भी हलाकान हो गए। सभी ओर त्राहि-त्राहि मच गई। ऋषि-मुनि व आमजन भूख से थर्रा गए। तब आदि देवी शक्ति शाकंभरी की पुकार की गई। शाकंभरी देवी प्रकट हुई और अन्न, फल, फूल व औषधि का भंडार दे गई। इससे ऋषि-मुनि समेत आमजनों की भूख व दर्द दूर हो गया। इसी की याद में छेरछेरा मनाए जाने की बात कही जाती है।

              दुर्ग सांसद विजय बघेल ने छत्तीसगढ़ के पारंपरिक और ऐतिहासिक पर्व पर उपस्थित सभी सभाजनों को अपनी ढेर सारी शुभकामनाएं दी साथ ही कहा कि वर्तमान समय ब्रह्मकुमारी बहनों द्वारा लुप्त होते इस पर्व को बहुत ही सुंदर ढंग से मना रहे हैं । जिसके लिएसभी को ढेर सारी बधाई एवं शुभकामनाएं ।

           दुर्ग नगर निगम के महापौर श्रीमती अलका बाघमार ने छत्तीसगढ़ी में बोलते हुए कहा कि "आनंद सरोवर" के इस प्रांगण में कदम रखते हुए शांति की अविरल प्रकंपन की अनुभूति होती है । छत्तीसगढ़ के बहुत सारे पारंपरिक पर्व को आज की पीढ़ी भूलते जा रही है । ब्रह्मकुमारी बहनों का हृदय से धन्यवाद जिन्होंने इस पर्व को सुंदर ढंग से मनाने की शुरुआत की है । जैसे हर राज्य में फसल की कटाई के पश्चात त्यौहार मनाते हैं जैसे पंजाब में फसल कटाई के पश्चात त्यौहार मनाते हैं उसी प्रकार छत्तीसगढ़ में भी धान कटाई के पश्चात यह छेरछेरा पुन्नी पर्व मनाया जाता है । यह पर्व दान देने से भंडार भरने का याद दिलाता है ।

   श्रीमती सुनीता बोहरा (उपाध्यक्ष स्काउट गाइड छत्तीसगढ़ राज्य) ने सभी अतिथियों के प्रति आभार जताया एवं कहा कि छत्तीसगढ़ का पारंपरिक पर्व छेरछेरा पुन्नी हमें दान देने के परंपरा का याद दिलाता है । ब्रह्माकुमारीज में भी कहा जाता है कलयुग बदल सतयुग अभी निकट भविष्य में आने वाला है जहां सब धन-धान्य से भरपूर एवं संपन्न होंगे । यह पर्व हमें लेने के बजाय देना सिखाता है । जितना हम औरों को देते हैं उतना ही स्वयं संपन्नता का अनुभव करते हैं । 

         मंच संचालन करते हुए ब्रह्माकुमारी चैतन्य प्रभा ने छेरछेरा पुन्नी पर्व की बहुत सुंदर कविता सभी को सुनायी ।


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