भागीरथपुरा मामला: हाईकोर्ट में पेश प्रारंभिक रिपोर्ट पर उठे सवाल, ओवरहेड टैंक में पोटैशियम क्लोराइड डाले जाने की आशंका
इंदौर। भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से हुई मौतों के मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है। इस प्रकरण की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट में जांच आयोग ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट पेश की, जबकि विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने के लिए एक महीने का समय मांगा गया है। अगली सुनवाई 6 अप्रैल को तय की गई है।
इस बीच, अदालत में कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागडिया ने एक अंतरिम आवेदन पेश कर दावा किया कि भागीरथपुरा के ओवरहेड टैंक में कथित रूप से पोटेशियम क्लोराइड की गोलियां डाली गई थीं।
पोटेशियम क्लोराइड डालने की हो जांच
वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागडिया ने कहा यह कार्य अधिकृत प्रक्रिया के तहत नहीं हुआ और इसकी निष्पक्ष जांच होना बेहद जरूरी है। उन्होंने स्वतंत्र पुलिस जांच की मांग करते हुए इसे गंभीर लापरवाही या संभावित साजिश का मामला बताया। कोर्ट को बताया गया कि इंदौर शहर में पानी की आपूर्ति मुख्य रूप से नर्मदा परियोजना, यशवंत सागर बांध और बिलावली जल स्रोत से होती है।
इन स्रोतों से लाया गया पानी जल शोधन केंद्रों पर साफ किया जाता है और क्लोरीन मिलाने के बाद विभिन्न ओवरहेड टैंकों तक पहुंचाया जाता है। वहां से पाइपलाइन के जरिए घरों में सप्लाई की जाती है।
स्थानीय भंडारण या वितरण में समस्या
जलूद स्टेशन से आने वाली लाइन में तीसरे अंतिम टैंक तक पानी की गुणवत्ता ठीक पाई गई, लेकिन जिन अंतिम दो टैंकों से भागीरथपुरा क्षेत्र में पानी पहुंचता है, वहीं पानी दूषित मिला है। इस तथ्य से यह संकेत मिलता है कि समस्या मुख्य जल शोधन केंद्र पर नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर भंडारण या वितरण प्रणाली में उत्पन्न हुई हो सकती है।
याचिका में यह भी कहा गया कि शहर के अन्य इलाकों में भूजल में बैक्टीरिया की मौजूदगी के बावजूद बीमारी और मौतों की घटनाएं केवल भागीरथपुरा तक सीमित रहीं।
स्वास्थ्य के लिए खतरा है पोटेशियम क्लोराइड
यदि सामान्य बैक्टीरिया कारण होते, तो अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे मामले सामने आते। अदालत को यह भी बताया गया कि संबंधित ओवरहेड टैंक में कथित रूप से पोटेशियम क्लोराइड टैबलेट डाली गई थीं, जो नगर निगम की नियमित खरीद प्रक्रिया से नहीं ली गई थीं।
यह पदार्थ पेयजल शोधन के मानकों के तहत स्वीकृत कीटाणुनाशक नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका उपयोग जल को शुद्ध करने के लिए नहीं किया जाता। यदि इसे वास्तव में पानी में मिलाया गया है, तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हो सकता है।
प्रशासनिक लापरवाही की ओर मुड़ा मामला
कुछ स्थानीय निवासियों ने यह भी दावा किया कि पानी में दवाई जैसी गंध थी और उसका रंग भी सामान्य नहीं था। जिन लोगों ने उस टैंक के नीचे लगे नलों से पानी भरा था, उनमें से कई बीमार पड़ गए। इन लोगों के बयान रिकॉर्ड किए गए हैं, जिन्हें अदालत में प्रस्तुत किया जाना है।
कुल मिलाकर यह मामला अब केवल दूषित पानी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें प्रशासनिक प्रक्रिया, निगरानी तंत्र और संभावित लापरवाही जैसे कई पहलुओं की जांच जरूरी हो गई है। अदालत की अगली सुनवाई में इस पर और स्पष्टता आने की उम्मीद है।
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