हाईकोर्ट सख्त: सरकारी वकीलों की योग्यता पर उठाए सवाल, मुख्य सचिव को दी समीक्षा की जिम्मेदारी
जबलपुर।मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील की कमजोर तैयारी पर कड़ी नाराजगी जताई है और राज्य सरकार को स्पष्ट संदेश दिया है कि अदालत में सरकार की ओर से पेश होने वाले वकील पूरी योग्यता और तैयारी के साथ आएं। अदालत ने इस मामले में मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि प्रदेश में नियुक्त सरकारी वकीलों की योग्यता और क्षमता की समीक्षा की जाए, ताकि अदालतों में मामलों की सही ढंग से पैरवी हो सके। यह मामला सिंगरौली जिले के सरई थाना क्षेत्र में हुई एक हत्या से जुड़ा है।
कोर्ट ने स्वीकार की एक आरोपी की बेल
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने 21 नवंबर 2017 को दो आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में दोनों आरोपियों ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की और साथ ही जमानत के लिए भी आवेदन किया। जब हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें विवेक अग्रवाल और रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन शामिल थे, ने मामले की सुनवाई की तो पाया कि एक आरोपी का नाम मूल एफआईआर में ही दर्ज नहीं था। इस आधार पर अदालत ने उसे जमानत दे दी। वहीं दूसरे आरोपी बच्चेलाल के मामले में अदालत ने पाया कि हत्या में इस्तेमाल की गई लाठी उसकी निशानदेही पर बरामद हुई थी और उस पर मानव रक्त भी पाया गया था।
जानकारी नहीं दे पाए सरकारी वकील
इस साक्ष्य के आधार पर अदालत ने उसे जमानत देने से इनकार कर दिया। इस तरह अदालत ने दोनों आरोपियों के मामलों को अलग-अलग आधार पर परखा और उसी अनुसार फैसला सुनाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने एक गंभीर बात यह भी देखी कि राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सरकारी वकील मामले की पूरी तैयारी के बिना ही अदालत में उपस्थित हुए थे। जब न्यायाधीशों ने उनसे केस से जुड़े सवाल पूछे तो वे संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए। इस स्थिति पर अदालत ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की और कहा कि यह बेहद गंभीर मामला है।
कोर्ट ने कहा भविष्य में न बने ऐसी स्थिति
अदालत में सरकार का पक्ष रखने वाले वकीलों की जिम्मेदारी होती है कि वे केस की पूरी जानकारी और तैयारी के साथ उपस्थित हों। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अदालतों में सरकारी वकीलों की नियुक्ति केवल योग्यता, दक्षता और अनुभव के आधार पर ही की जाए। अदालत ने अपने आदेश की प्रति मुख्य सचिव को भेजते हुए प्रदेश में नियुक्त सरकारी अधिवक्ताओं की सूची की समीक्षा करने के निर्देश दिए ताकि भविष्य में इस तरह की स्थिति न बने।
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