Jwala

Express News

छत्तीसगढ़ जनसंपर्क

आदिवासी समाज की परंपरागत व्यवस्था सामाजिक एकता, न्याय और सुशासन का उत्कृष्ट उदाहरण- राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु

आदिवासी समाज की परंपरागत व्यवस्था सामाजिक एकता, न्याय और सुशासन का उत्कृष्ट उदाहरण- राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु

779231020261343361010792598.jpg

मुरिया दरबार में राष्ट्रपति ने आदिवासी समाज की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक व्यवस्था की सराहना की*

*राष्ट्रपति ने कहा-मैं भी मांझी की बेटी हूं, आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपराओं से मेरा गहरा जुड़ाव*

*शिक्षा और विकास के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत और पहचान को सुरक्षित रखना जरूरी*

*नक्सलवाद जैसी चुनौतियों का सामना करने के लिए समाज को एकजुट होने का किया आह्वान*

रायपुर/ राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने ऐतिहासिक बस्तर दशहरा के अंतर्गत आयोजित मुरिया दरबार में आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, परंपरागत सामाजिक व्यवस्था और सामूहिक निर्णय प्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि आदिवासी समाज की परंपरागत व्यवस्था सामाजिक एकता, न्याय, आपसी सहयोग और सुशासन का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा कि समय के साथ शासन व्यवस्था, नीतियां और कानून बदलते रहते हैं, लेकिन आदिवासी समाज ने अपनी परंपराओं, सामाजिक नियमों और अलिखित संविधान को पीढ़ियों से जीवित रखा है। यह व्यवस्था समाज में सुख-शांति, प्रेम, सद्भाव और सामूहिकता बनाए रखने का महत्वपूर्ण आधार है

        राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मु ने मुरिया दरबार में उपस्थित आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों और पारंपरिक प्रमुखों को संबोधित करते हुए कहा कि आप सभी ने मुझे एक बार फिर अपनी संस्कृति और परंपराओं से रूबरू होने का अवसर दिया है। इसके लिए मैं आप सभी की आभारी हूं। उन्होंने कहा कि मैं भी इसी आदिवासी संस्कृति और परंपरा से आती हूं। मेरे दादाजी मांझी थे, मेरे पिताजी भी मांझी थे और मेरे भाई भी मांझी हुआ करते थे। मैं एक मांझी की बेटी हूं, गांव के मुखिया की बेटी हूं। उन्होंने कहा कि उनके परिवार के सदस्य आज भले ही उनके बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं के प्रति उनका जुड़ाव आज भी उतना ही गहरा है।

        राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु ने कहा कि देश में पहले राजाओं का शासन था, इसके बाद अंग्रेजों का शासन आया और आज भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है। समय के साथ शासन व्यवस्था और कानूनों में परिवर्तन हुआ है, लेकिन आदिवासी समाज की अपनी पारंपरिक व्यवस्था आज भी विद्यमान हैं जो किसी पुस्तक में नहीं लिखा गया है, लेकिन समाज के लोग पीढ़ियों से इसका पालन करते आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में लोग मिल-जुलकर पूजा-अर्चना करते हैं, विवाह एवं अन्य सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं तथा सामूहिक रूप से पर्व-त्यौहार मनाते हैं। नृत्य, गीत-संगीत और सामूहिक उत्सवों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखते हैं। उन्होंने इस समृद्ध विरासत को संरक्षित रखने के लिए समाज के लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। राष्ट्रपति ने कहा कि संस्कृति, परंपरा, संविधान और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज में सुख-शांति, आनंद और प्रेम बनाए रखना है। इस दृष्टि से आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था अत्यंत सुंदर और उत्कृष्ट है।

       राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु ने आदिवासी समाज की पारंपरिक न्याय व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि गांवों में मांझी और अन्य पारंपरिक प्रमुखों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। परिवारों के बीच विवाद, जमीन-जायदाद से संबंधित समस्याएं अथवा आपसी मतभेद होने पर लोग मांझी के पास जाते हैं। मांझी गांव के लोगों को एकत्रित कर सभी पक्षों की बात सुनते हैं और आपसी सहमति से समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में गांव के प्रमुख व्यक्तियों और बुजुर्गों की सहभागिता से सामूहिक निर्णय लेने की समृद्ध परंपरा रही है। इस व्यवस्था में पीड़ परगना और देश परगना जैसी पारंपरिक संस्थाओं का भी विशेष महत्व रहा है। गांव स्तर पर समाधान नहीं होने पर समस्याओं को पीड़ परगना और आवश्यकता पड़ने पर देश परगना के समक्ष रखा जाता था।

*आदिवासी समाज की एकता, सामूहिक जिम्मेदारी और आपसी विश्वास को दर्शाती है*

       राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मु ने कहा कि पहले लगभग 50 से 52 गांवों को मिलाकर एक पीड़ की व्यवस्था हुआ करती थी। बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए समाज के लोग कई दिनों तक सामूहिक बैठकें करते थे। कभी-कभी सात से आठ दिनों तक लगातार विचार-विमर्श चलता था और समाधान निकलने तक प्रयास जारी रहते थे। यह परंपरा आदिवासी समाज की एकता, सामूहिक जिम्मेदारी और आपसी विश्वास को दर्शाती है।

*आपसी संवाद और सहमति से विवादों का समाधान करने पर दिया जोर*

        राष्ट्रपति ने कहा कि आधुनिक न्यायिक व्यवस्था में समस्याओं के समाधान के लिए पुलिस, थाना और न्यायालयों का सहारा लिया जाता है। कई मामलों में न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया लंबी हो जाती है और इसमें समय तथा धन दोनों खर्च होते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ विवादों के समाधान में दस-बीस या तीस वर्ष तक लग जाते हैं। उन्होंने आग्रह किया कि जहां संभव हो और कानून के अनुरूप हो, वहां समाज के लोग आपसी बातचीत, सहमति और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के माध्यम से विवादों का समाधान करने का प्रयास करें। उन्होंने मुरिया दरबार की इस ऐतिहासिक परंपरा को बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की आवश्यकता बताई।

       राष्ट्रपति ने कहा कि वर्तमान लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के अलग-अलग दायित्व हैं, जबकि आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था में मांझी सामाजिक नेतृत्व, विवाद समाधान और सामुदायिक निर्णयों से जुड़ी अनेक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं।

         राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु ने कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति में आध्यात्मिकता, सामूहिकता और प्रकृति के प्रति आस्था का विशेष स्थान है। गांवों में ग्राम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की प्राचीन परंपरा रही है। समाज के लोग एकजुट होकर गांव की सुख-समृद्धि, खुशहाली, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना करते हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के पर्व-त्यौहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं। समाज के लोग सामूहिक रूप से नाचते-गाते हैं, उत्सव मनाते हैं और खुशियां बांटते हैं। यही सामूहिकता आदिवासी संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है।

         उन्होंने आदिवासी समाज के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि अंग्रेजी शासन और राजाओं के समय आदिवासी समाज ने अपने अधिकारों, सम्मान और अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष किया था। 

*बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाएं, विकास के साथ संस्कृति का भी करें संरक्षण*

         राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु ने आदिवासी समाज से बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ समाज को आगे बढ़ना आवश्यक है। बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाएं, उन्हें पढ़ने-लिखने और जीवन में प्रगति करने का अवसर प्रदान करें। उन्होंने कहा कि समय के साथ सोच में सकारात्मक परिवर्तन लाना और विकास के नए अवसरों को अपनाना जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक पहचान को त्यागना नहीं होना चाहिए। 

       राष्ट्रपति ने कहा कि विकास और सांस्कृतिक संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं। आधुनिक शिक्षा, नई सोच और विकास के अवसरों को अपनाते हुए अपनी सांस्कृतिक विरासत, रीति-रिवाजों और सामाजिक मूल्यों को सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने समाज के लोगों से अपनी जड़ों से जुड़े रहने, पारंपरिक संस्थाओं का सम्मान करने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से परिचित कराने का आग्रह किया। राष्ट्रपति ने कहा कि सरकार आदिवासी समाज के विकास और कल्याण के लिए सहयोग कर रही है तथा आगे भी करती रहेगी। उन्होंने समाज के लोगों से शिक्षा, सामाजिक एकता और विकास के माध्यम से सशक्त बनने का आह्वान किया।

*मुरिया दरबार की परंपरा को जीवित रखने का किया आह्वान*

         राष्ट्रपति ने मुरिया दरबार जैसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित रखने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज की पहचान उसकी संस्कृति, परंपराओं और सामूहिक मूल्यों से होती है। चाहे इन परंपराओं का उल्लेख सरकारी अभिलेखों में हो अथवा न हो, समाज के लोगों को अपनी सामाजिक संस्थाओं और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की परंपरागत व्यवस्था में आपसी भाईचारा, प्रेम, सद्भाव, सामाजिक न्याय और सुशासन की भावना निहित है। इन मूल्यों को बनाए रखना वर्तमान और भावी पीढ़ियों की सामूहिक जिम्मेदारी है। अपने संबोधन के अंत में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने बस्तर के आदिवासी समाज से मिले स्नेह, सम्मान और आत्मीय स्वागत के लिए हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि आप सभी के बीच आकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई है। अपनी संस्कृति और परंपराओं के प्रति आपका समर्पण प्रेरणादायक है। 

          इस दौरान राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु, राज्यपाल श्री रमेन डेका और मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय को स्मृति चिह्न भेंट किया गया। 

          इस गरिमामयी अवसर पर बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष व सांसद श्री महेश कश्यप, उपाध्यक्ष श्री बलराम मांझी, फरसपाल के मांझी श्री अर्जुन मांझी, हमीरगढ़ के मांझी श्री शशिभूषण मांझी और किलेपाल के श्री गंगाधर मांझी ने भी अपने विचार व्यक्त कर बस्तर दशहरा पर्व के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में शामिल होने के लिए राष्ट्रपति के प्रति कृतज्ञता प्रकट किया। इस दौरान बस्तर राज परिवार के सदस्य श्री कमलचन्द्र भंजदेव, उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री राजेश अग्रवाल, वन मंत्री श्री केदार कश्यप, कांकेर सांसद श्री भोजराज नाग, जगदलपुर विधायक श्री किरण सिंह देव, महापौर श्री संजय पाण्डे सहित मुख्यमंत्री के सचिव श्री राहुल भगत, कमिश्नर श्री डोमन सिंह, आईजी श्री बीएन मीणा, कलेक्टर श्री आकाश छिकारा, एसपी श्री शलभ सिन्हा सहित अनेक जनप्रतिनिधि, पारंपरिक मांझी-चालकी, मेंबर-मेंबरिन, नाइक-पाइक और बस्तर दशहरा समिति के सदस्य एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।



एक टिप्पणी छोड़ें

Data has beed successfully submit

488051120261926221011111638.jpg
453051120261925361011111633.jpg
437021120260634491010996317.jpg
336231020261223311010791831.png

Related News

Advertisement

Advertisement

ताज़ा समाचार

Popular Post

This Week
This Month
All Time

Advertisement

Advertisement

स्वामी

संपादक- पवन देवांगन 

पता - बी- 8 प्रेस कॉम्लेक्स इन्दिरा मार्केट
दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

ई - मेल :  dakshinapath@gmail.com

मो.- 9425242182, 7746042182

हमारे बारे में

हिंदी प्रिंट मीडिया के साथ शुरू हुआ दक्षिणापथ समाचार पत्र का सफर आप सुधि पाठकों की मांग पर वेब पोर्टल तक पहुंच गया है। प्रेम व भरोसे का यह सफर इसी तरह नया मुकाम गढ़ता रहे, इसी उम्मीद में दक्षिणापथ सदा आपके संग है।

सम्पूर्ण न्यायिक प्रकरणों के लिये न्यायालयीन क्षेत्र दुर्ग होगा।

स्वामी / संपादक : ज्वाला प्रसाद अग्रवाल

सिंधी कॉलोनी, सिंधी गुरुद्वारा के पीछे, दुर्ग, छत्तीसगढ़, पिनकोड - 491001

मो.- 9993590905

विज्ञापन एवं सहयोग के लिए इस पर भुगतान करें

बैंक का नाम : IDBI BANK

खाता नं. : 525104000006026

IFS CODE: IBKL0000525

Address : Dani building, Polsaipara, station road, Durg, C.G. - 490001

SCAN QR
qr-paytm
SCAN QR
Googlepay

Copyright 2025-26 JwalaExpress - All Rights Reserved

Designed By - Global Infotech.