ट्रेन में अश्लील हरकतों के आरोपी जज को राहत देने पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, कहा— व्यवहार घिनौना और गंभीर दुर्व्यवहार
नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें एक सिविल जज की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने जज पर लगे आरोपों को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा कि उनका आचरण “घिनौना” और “गंभीर दुर्व्यवहार” की श्रेणी में आता है तथा ऐसे मामले में बर्खास्तगी उचित थी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह मामला चौंकाने वाला है। पीठ ने टिप्पणी की कि जिस तरह का व्यवहार न्यायिक अधिकारी के खिलाफ सामने आया है, उसमें सेवा से हटाया जाना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के विवादित फैसले के प्रभाव और क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए नोटिस जारी किया है और चार सप्ताह में जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद होगी।
2018 में ट्रेन में हंगामे का मामला
मामले में आरोपी मध्य प्रदेश का एक सिविल जज (क्लास-II) है, जिसे वर्ष 2018 में ट्रेन में हंगामा करने के आरोप में सेवा से हटा दिया गया था। आरोप है कि उसने नशे की हालत में सह-यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार किया, ड्यूटी पर तैनात टीटीई/कंडक्टर को गालियां दीं और एक महिला यात्री के सामने अश्लील इशारे किए। इतना ही नहीं, उसने महिला की सीट के सामने पेशाब भी किया और सह-यात्रियों को अपना पहचान पत्र दिखाकर धमकाया।
जांच अधिकारी ने सभी आरोपों को सही पाया था, जिसके बाद प्रशासनिक समिति ने जज को हटाने की सिफारिश की। इस सिफारिश को हाई कोर्ट की फुल बेंच ने मंजूरी दी और अंततः राज्यपाल ने बर्खास्तगी का आदेश जारी किया।
हाई कोर्ट से मिली थी राहत
बर्खास्तगी के बाद संबंधित न्यायिक अधिकारी ने हाई कोर्ट का रुख किया। डिवीजन बेंच ने उनकी याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए राज्यपाल द्वारा पारित बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया था। हालांकि, जांच अधिकारी, प्रशासनिक समिति और फुल बेंच—तीनों ने आरोपों को सही माना था। इसके बावजूद हाई कोर्ट ने उन्हें बहाल करने का निर्देश दिया और बिना अनुमति यात्रा करने तथा गिरफ्तारी की सूचना न देने जैसे आरोपों पर केवल मामूली सजा देने की छूट दी।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के इस रुख पर कड़ी आपत्ति जताई। सुनवाई के दौरान प्रतिवादी के वकील ने दलील दी कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार संबंधित समय पर अधिकारी नशे में नहीं था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपित आचरण स्वयं में बेहद गंभीर है और न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती।
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