इन पुराने दस्तावेजों का कसूर क्या था जो सालों से देखरेख के नाम पर सिर्फ फाइलों में धूल फांकते रहे? अब जब वो नष्ट होने की कगार पर हैं, तब डिजिटल की दुहाई देकर हाथ झाड़ लेना क्या जिम्मेदारी से भागना नहीं है? दुर्ग नगर निगम का जर्जर भवन या रिकॉर्ड की कब्रगाह ? बारिश में बह रहे दस्तावेज, जिम्मेदारों की नींद अभी भी नहीं टूटी पढ़ें पूरी खबर, देखे वीडियो
ज्वाला एक्सप्रेस न्यूज
नगर निगम दुर्ग को चाहिए कि सिर्फ ई-रिकॉर्डिंग की योजना न गढ़े, बल्कि इस भवन और वहां रखे दस्तावेजों को तुरंत सुरक्षित करने की कार्रवाई करे। वरना आने वाली पीढ़ियां जब नगर निगम से अपने इतिहास के दस्तावेज मांगेंगी, तो निगम के पास सिवाय बहानों के कुछ नहीं होगा।

दुर्ग। नगर निगम दुर्ग का पुराना प्रशासनिक भवन अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। मरम्मत के अभाव में यह भवन जर्जर स्थिति में पहुंच चुका है। इस भवन में वर्तमान में रिकॉर्ड रूम और कुछ कार्यालय संचालित हो रहे हैं, लेकिन बारिश ने इनकी हालत और बदतर कर दी है।
मौके पर देखा गया कि रिकॉर्ड रूम में चारों ओर पानी ही पानी है। भवन की छत और दीवारों से पानी टपक रहा है। कर्मचारी कभी पानी निकालने में लगे हुए दिखे, तो कभी भीगते रिकॉर्ड को बचाने में। लगातार बारिश से दस्तावेज भीगकर खराब होने की कगार पर पहुंच गए हैं।
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का मानना है कि नगर निगम दुर्ग के जिम्मेदारों की इस दिशा में दिलचस्पी नहीं दिख रही है, तभी तो कागजों पर उपयोग दिखाकर भवन को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। अगर जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में यह रिकॉर्ड पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे और निगम की ऐतिहासिक धरोहर भी मिट जाएगी।
? बड़ा सवाल ये है कि:
क्या नगर निगम को अपने ही शहर के इतिहास और दस्तावेजों की कोई परवाह नहीं?
क्या जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि तब जागेंगे जब ये रिकॉर्ड पूरी तरह गलकर नष्ट हो जाएंगे?
बारिश ने इस जर्जर भवन की हकीकत एक बार फिर सबके सामने ला दी है। रिकॉर्ड रूम में पानी ही पानी है, फाइलें भीगकर गलने लगी हैं। कर्मचारी कभी बाल्टी से पानी निकालते दिखते हैं तो कभी रिकॉर्ड को बचाने की नाकाम कोशिश करते।
पूर्व पार्षद ओमप्रकाश सेन भी नाराज हैं। उन्होंने कहा,
“ये भवन अब संभलने लायक नहीं बचा। मरम्मत तो जरूरी है
नगर निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल ने कहा कि
“अब रिकॉर्ड को ई-रिकॉर्ड में बदला जाएगा। नए दस्तावेज स्कैन कर सहेजे जाएंगे। पुराने दस्तावेजों को बचा पाना संभव नहीं है। इसके लिए प्रोग्रामिंग शुरू हो गई है। जाएंगे, जबकि पुराने दस्तावेजों को सहेजना अब संभव नहीं है।”
? मगर सवाल फिर वही:
इन पुराने दस्तावेजों का कसूर क्या था जो सालों से देखरेख के नाम पर सिर्फ फाइलों में धूल फांकते रहे? अब जब वो नष्ट होने की कगार पर हैं, तब डिजिटल की दुहाई देकर हाथ झाड़ लेना क्या जिम्मेदारी से भागना नहीं है?
स्थानीय नागरिकों में भी रोष है। उनका कहना है,
“नगर निगम ने इस भवन को बस कागजों पर जिंदा रखा है। हकीकत में यह सिर्फ रिकॉर्ड की कब्रगाह बनकर रह गया है।"
? अब वक्त है जनता को भी सवाल पूछने का:
कौन जिम्मेदार है इन बहुमूल्य दस्तावेजों की बर्बादी का?
क्या दुर्ग के इतिहास को यूं ही बारिश में बह जाने दिया जाएगा?
क्या अधिकारी और जनप्रतिनिधि सिर्फ आश्वासन की चाशनी चखाकर अपनी जिम्मेदारी खत्म कर देंगे?
नगर निगम को चाहिए कि सिर्फ ई-रिकॉर्डिंग की योजना न गढ़े, बल्कि इस भवन और वहां रखे दस्तावेजों को तुरंत सुरक्षित करने की कार्रवाई करे। वरना आने वाली पीढ़ियां जब नगर निगम से अपने इतिहास के दस्तावेज मांगेंगी, तो निगम के पास सिवाय बहानों के कुछ नहीं होगा।
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