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हल्द्वानी अतिक्रमण मामला: रेलवे भूमि पर रहने का हक नहीं, पुनर्वास के लिए शिविर लगाने के निर्देश

हल्द्वानी अतिक्रमण मामला: रेलवे भूमि पर रहने का हक नहीं, पुनर्वास के लिए शिविर लगाने के निर्देश

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नई दिल्ली/हल्द्वानी। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के हल्द्वानी में रेलवे भूमि पर अतिक्रमण के मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि रेलवे की जमीन पर कब्जा करने वालों को वहां रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित भूमि रेलवे की संपत्ति है और अतिक्रमणकारियों को उसी स्थान पर पुनर्वास की मांग करने का अधिकार नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि किसी भी महत्वाकांक्षी परियोजना, विशेषकर रेलवे लाइन विस्तार जैसे कार्यों के लिए दोनों ओर खाली स्थान की आवश्यकता होती है। “वहां रहने वाले लोग यह तय नहीं कर सकते कि रेलवे लाइन कहां बिछाई जाए,” पीठ ने टिप्पणी की।

हालांकि अदालत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया को भी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। शीर्ष अदालत ने नैनीताल के जिलाधिकारी, हल्द्वानी के उपजिलाधिकारी और जिला स्तरीय विधि सेवा प्राधिकरण के सदस्यों समेत अन्य अधिकारियों को क्षेत्र का दौरा कर विशेष शिविर आयोजित करने को कहा। इन शिविरों के माध्यम से बेदखली का सामना कर रहे परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के तहत आवेदन पत्र भरने और अन्य औपचारिकताएं पूरी करने में सहायता दी जाएगी।

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि उनके मुवक्किल पिछले चार से पांच दशकों से हल्द्वानी रेलवे स्टेशन और आसपास के क्षेत्र में रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने पहले इस क्षेत्र को नियमित करने की बात कही थी, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

वहीं, एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने तर्क दिया कि क्षेत्र में कई धार्मिक स्थल मौजूद हैं और लोगों को हटाने से पहले उनके पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

इस पर सीजेआई ने कहा, “इन लोगों पर दया कीजिए। ये लोग बेहद खराब परिस्थितियों में रह रहे हैं, जहां पीने योग्य पानी, बिजली और सीवेज की समुचित व्यवस्था नहीं है। उन्हें स्वयं निर्णय लेने दीजिए कि वे पीएमएवाई योजना के तहत आवास चाहते हैं या नहीं। यदि कोई कठिनाई आती है, तो अदालत उसका समाधान करेगी।”

अदालत के इस फैसले से जहां रेलवे परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ है, वहीं प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए प्रशासन को सक्रिय भूमिका निभाने के निर्देश भी दिए गए हैं।



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